गुरुवार, 1 सितंबर 2011

महज एक गांव नहीं है रालेगण

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इस गांव में अब कोई सोता नहीं
इस गांव में अब कोई रोता नहीं
बात हुनर की नहीं हौसले की है
अब यहां तिनकों में तूफान उतर आया है
जिन आंखों ने कभी रोशनी देखी न थी
उन आंखों में अब सूरज उतर आया है
जिन लबों ने बोलना सीखा न था
उन लबों पर अब शोर उतर आया है
वो सोचते थे कतरों का क्या है आ मिलेंगे दरिया से
इन कतरों में अब समंदर उतर आया है
इस गांव में अब कोई सोता नहीं
अब यहां बेहतरी का ख्वाब उतर आया है
वो सोचते थे ये मोम के परिन्दे हैं, जल जाएंगे
अब सूरज पूछ रहा हैहौसला क्या है
वो सोचते थे ये दीये हैं पनाह मांगेंगे
अब तूफान पूछ रहा है, माजरा क्या है ?
इस गांव में अब कोई सोता नहीं
इस गांव में अब कोई रोता नहीं
मुल्क बनाने का तसव्वुर है यहां
अब हर शहर पूछ रहा है पता क्या है ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. अब यहां तिनकों में तूफान उतर आया है...
    bahut khoob sir.

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  2. हर शख़्स में अब यहां एक ही अक्स बसता है
    जिसकी सांसों से तूफ़ान भी डरता है
    उस अक्स की ताक़त से
    ये गांव हर रोज़ नहाता है
    इस गांव में अब कोई सोता नहीं
    इस गांव में अब कोई रोता नहीं

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  3. इस गांव में अब कोई सोता नहीं, इस गांव में अब कोई रोता नहीं...
    मुल्क बनाने का तसव्वुर है यहां
    अब हर शहर पूछ रहा है पता क्या है ?

    गांव की तलाश में शहर की बेचैनी.... शानदार..। एक ईमानदार कोशिश कुछ भी कर सकती है, कुछ भी बदल सकती है... अन्ना और उनका गांव शहरों की नजीर नहीं देते, शहर उनका पता ढूंढ रहे हैं। अद्भुत...।

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