शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

कुछ तो कहो !

हमारे यहां परंपरा में मौनव्रत को मान्यता मिली हुई है। माना जाताहै कि मौन व्रत से आध्यात्मिक शक्ति मिलती है, कई रोगों का निवारण इससे होता है। लेकिन परंपरा ये भी कहती है कि चुपचाप जुर्म सहना मौन रहना नहीं कायरता है, और जुर्म होते देखना लेकिन उससे भी बड़ा जुर्म । अगर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को दरकिनार भी कर दिया जाए तो परंपरा के मुताबिक मनमोहन सिंह पाक साफ नहीं ठहरते। उनकी परेशानी ये है कि सियासत में कुछ काम खामोशी से ही अंजाम दिए जाते हैं, लेकिन जब मामला अदालत में आ जाए तो उस खामोशी का सबब हलफनामा देकर बताना पड़ता है। प्रधानमंत्री पर इल्जाम ये नहीं कि राजा की तरह उनका दामन दागदार है, उनपर इल्जाम ये है कि 2 नवंबर 2007 को राजा को इमानदारी की नसीहत देने के बाद वो इस मामले में पूरी तरह खामोश हो गए। वो तब भी खामोश रहे जब राजा का विरोध कानून मंत्रालय से लेकर वित्त मंत्रालय कर रहा था, वो तब भी खामोश रहे जब राजा ट्राय के गठित होने की वजह को ही अपने फ़ैसलों से खत्म कर रहे थे, वो तब भी खामोश रहे जब सुब्रमण्यम स्वामी और सीताराम येचुरी ने उनसे राजा पर कार्रवाई करने की दरख्वास्त की। वो तब भी खामोश रहे जब कैबिनेट सचिव ने मंत्रियों के समूह का टर्म ऑफ रेफरेंस ही बदल डाला। कानूनी नजरिए से देखा जाए तो इनमें से हर एक खामोशी गैरकानूनी थी, अवैध थी। देश के प्रधानमंत्री को अगर सहयोगी दल के दबाव और संविधान में दिए गए अधिकार के इस्तेमाल में से एक को चुनना हो और वो सहयोगी दल के दबाव के आगे झुक जाए तो ये सवाल सिर्फ सियासत का नहीं नैतिकता का भी बनता है। 1993 में जब हर्षद मेहता के सिक्यूरिटी स्कैम की जांच करनेवाली जेपीसी ने देश के वित्तमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए थे तब उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी। लेकिन वो घोटाला महज 4 हजार करोड़ का था। राजा का स्पेक्ट्रम घोटाला उससे 45 गुना ज्यादा बड़ा है। लेकिन प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट में उनकी पैरवी कर रहे वकीलों की टीम बदलने से ज्यादा अब तक कुछ भी नहीं किया है। और अगर नैतिकता की बात आज की सियासत में करना अजूबा माना जाए तो भी सियासत में खामोशी की कीमत चुकानी पड़ती है। बोफोर्स मामले में क्वात्रोकी के गुनाह पर राजीव गांधी की खामोशी की सजा कांग्रेस को अगले आम चुनाव में करारी शिकस्त के तौर पर चुकानी पड़ी थी। अब जबकि अगले साल तमिलनाडु और यूपी में एसेंबली के इलेक्शन होने हैं क्या कांग्रेस इस खामोशी की कीमत चुकाने को तैयार है। ये सवाल सिर्फ अदालत का नहीं अवाम का भी है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कभी-कभी दिल यूं दुखता है कि दिल करता है कि....कुछ ना कहो

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  2. मनमोहन सिंह को मत कोसिये सरजी | वो तो दया के पात्र हैं |
    अपनी मर्जी से तो शायद खाना भी नहीं खाते होंगे | सम्मोहित किये गए किसी व्यक्ति को शायद आपने देखा हो | सम्मोहित
    करने वाले के इशारे पर ही वो सारा काम मशीनी अंदाज में
    करता जाता है | वही हाल बेचारे मनमोहन सिंह जी का है. उन्हें
    तो आला कमान से मुंह खोलने का इशारा मिलेगा तो बोलेंगें नहीं
    तो मौन धारण किये रहेंगे | और वैसे भी मौन में कितनी शक्ति है वो नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में देख चुके हैं | नरसिम्हा
    राव ने पूरे पांच साल मौन धारण कर गुजार लिए | और सिंह साहब को तो
    इसका व्यक्तिगत अनुभव है उनके साथ वित्त मंत्री के रूप में काम करके |
    अतः आप उनकी ख़ामोशी से विचलित ना होयें |

    वरुण

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