बुधवार, 24 नवंबर 2010

नीतीश पास, राहुल फेल


30 अक्टूबर को राहुल गांधी ने बिहार के भागलपुर में एक सवाल उठाया था कि अगर बिहार चमक रहा है तो बिहारी हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में क्या कर रहा है। अब चुनाव के नतीजे बताते हैं कि, राहुल माने या ना माने बिहार चमक रहा है, लेकिन इसे पहले से कहीं ज्यादा चमकाने की जिम्मेदारी अब कांग्रेस को नहीं एक बार फिर नीतीश को मिली है ..एनडीए को मिली है। जब राहुल ने मुंबई जाकर बालासाहेब को चुनौती दी थी तब सियासत के कई जानकार ये कहने लगे थे कि महज 4 घंटे के मुंबई दौरे में राहुल बिहार की गणेश परिक्रमा कर आए हैं। भीड़ से सीधा संवाद कायम करने का उनका हुनर, गरीब और युवाओं पर उनका असर , यूथ आइकन और ईमानदार नेता के तौर पर उनकी छवि के सम्मोहन में ऐसी बंधी पार्टी कि बिहार चुनाव में एक तरह से राहुल के बूते ही मैदान में उतर गई थी कांग्रेस। राहुल पांच बार बिहार के दौरे पर आए, पंद्रह जिलों में घूमे, निर्मली से नवादा तक सिकंदरपुर से शेखपुरा तक बहुत बड़ी तादाद में लोग उन्हें सुनने के लिए भी आए। अवाम ने राहुल को गौर से सुना .. ट्रेजरी घोटाले का मसला उठाते राहुल, केंद्र की योजनाओं का श्रेय लूटने केलिए नीतीश को जमकर खरी खोटी सुनाते राहुल .. लेकिन कहते हैं .. बिहार में रैली में सुनने आई भीड़ अलग होती है और वोट की कतार में लगी भीड़ अलग। नतीजा ये कि राहुल की उम्मीदों के विपरीत.. बिहार में कांग्रेस की सीटें बढ़ी नहीं ..घट गई। लेकिन क्या इस नतीजे से किसी को हैरानी होनी चाहिए। हकीकत ये है कि ये चुनाव नीतीश बनाम लालू था ...राहुल की तमाम कोशिशों और मेहनत के बावजूद ये चुनाव एनडीए बनाम यूपीए नहीं बन पाया। हकीकत ये भी है कि जिस टैलेंट हंट के जरिए राहुल देश भर में अपनी टीम तैयार कर रहे हैं उसकी साख बिहार में है ही नहीं। नहीं तो जिस दिन सोनिया गांधी बिहार के दौरे पर आईं उसी दिन बिहार के यूथ कांग्रेस के मुखिया ललन कुमार के पास से 6 लाख की कैश इलेक्शन कमीशन ने बरामद न की होती। हकीकत ये भी है कि पिछले साल हुए आमचुनाव में बिहार के जिन प्रत्याशियों के पक्ष में राहुल ने रैली की थी उनमें से एक जगह भी जैसे बक्सर, मधुबनी, खगड़िया और अररिया में कांग्रेस जीत दर्ज नहीं कर पाई थी। प्रदेश की 40 में से 37 सीटों पर चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस सिर्फ दो जगह सासाराम और किशनगंज मे जीत पाई थी और राहुल इनमें से किसी जगह का दौरा नहीं किया था। तो क्या राहुल चुक गए हैं। सिर्फ एक साल पहले तक राहुल का शुमार देश के सबसे बड़े स्टार कैंपेनर के तौर पर किया जा रहा था। जानकारों की दलील थी कि आम चुनाव के दौरान तमाम बड़े नेताओं की रैली और पार्टी की जीत के बीच का सबसे बेहतर औसत राहुल गांधी का ही है। अगले साल केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आसाम और पांडिचेरी के एसेंबली इलेक्शन हैं तो 2012 में यूपी में । राहुल की तैयारी और नज़र 2014 में होनेवाले आमचुनाव पर है। उनकी हसरत देश का अगला प्रधानमंत्री बनने की है। लेकिन बिहार चुनाव के नतीजे बताते हैं कि राहुल को अभी और ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है।

1 टिप्पणी:

  1. बिहार में ना तो राहुल फेक्टर चला और ना सोनिया फेक्टर... वहां तो विकास फेक्टर चला.. लोग विकास के साथ गए भले ही नेता विकास के नाम पर कितने भी रुपए कमाएं... लेकिन लोगों को जो बुनियादी सुविधाएं देगा जनता उसी का साथ देगी... कांग्रेस ने दिल्ली में बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई थी तो यहां शीला लगातार मुख्यमंत्री के पद पर बनी हुई है... यही है सर ये पब्लिक है ये सब जानती है...

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